अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अंततोगत्वा सब माटी है... !!

आना है
आकर फिर
चल देने की परिपाटी है...
माटी का दिया
माटी के इंसान
अंततोगत्वा सब माटी है...


कहते हैं, चलते रहने से
गंतव्य तक की दूरी
कम हो जाती है...
अंतिम बेला दिवस की
अवसान समीप  है
खुद से दूरियां भी कहाँ गयीं पाटी हैं...


निभ रही बस
आने और चल देने की परिपाटी है... !! 


4 टिप्पणियाँ:

ब्लॉग बुलेटिन 2 नवंबर 2015 को 5:33 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ब्लॉग बुलेटिन: प्रधानमंत्री जी के नाम एक दुखियारी भैंस का खुला ख़त , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रश्मि प्रभा... 2 नवंबर 2015 को 5:49 pm  

उसी मिट्टी के लिए उठापटक
छल-प्रपंच
मुखौटे
… भला ये कैसी दुनियादारी है !

रश्मि शर्मा 2 नवंबर 2015 को 6:15 pm  

Jivan ka satya ujagar kiya hai aapne.bahut badhiya.

Anita 3 नवंबर 2015 को 5:30 am  

very true

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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