अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ये फ़लक भी मन जैसा है... !!


ये फ़लक भी
मन जैसा है...


कितने रंग बदलता है...


एक पल उजास
तो ठीक अगले क्षण कोहरा 


फिर, ये गति कितनी ही बार दिन में,
लेती है खुद को दोहरा 


ठहरता नहीं कुछ :
न लालिमा...
न ही कोहरा...


डोर
समय के हाथों है...
हम तो मात्र हैं मोहरा... !!


कोई बहुत बड़ा दर्शण नहीं...
ये आम सी बात है...


सूरज के उगने की आहट थी...
अब कोहरे में खोया गगन उदास है... !!


शायद,
कोई मुस्कान
खिल आये क्षितिज पर 


कौन जाने
कोहरे को भेद
इसी क्षण सूरज उग आये... !!

*** *** ***
अन्यान्य कार्यों में लगा... खिड़की से दिखने वाले आकाश को... देखता मन... कैसी कैसी बातों में साम्य ढूंढता है... दिन की भाग दौड़ के लिए ज़रा सी सुकून भरी रौशनी आँखों में ले निकलने का भोला सा उपक्रम...

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 3 नवंबर 2015 को 11:49 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-11-2015) को "कलम को बात कहने दो" (चर्चा अंक 2150) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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