अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम्हारे प्रताप से... !!

आस की नैया
बहुत चली है तूफ़ानों में
ये अब है कि थकी हारी बैठी है...


सुस्ता ले कुछ पल
क्या पता फिर से चल पड़ेगी 


ये सहज होता जाता है...
नाव का किनारों से भी कोई तो नाता है... 


हो सकता है ऐसा भी...
होता ही है--
कुछ देर के लिए,
जीवन नेपथ्य में चला जाता है...
कभी कभी मंचाशीन होती हैं,
केवल अनेकानेक यंत्रणायें...


जीवन को उन्हें झेलना ही होता है
उद्विग्न लहरों से खेलना ही होता है 


ऐसी विपरीत परिस्थितयों से
जब हारे होते हैं...
तब हम बस
तुम्हारे सहारे होते हैं...


तुम उबार लाते हो...
बिखरे टुकड़ों को पुनः सजाते हो...


पटरी पर ले आते हो मन...
फिर स्वयं हो जाते हो जीवन...


तुम्हारी करुणा का जल
जो हुआ प्रवाहित अंतस्तल में...
आस की नैया चल पड़ी फिर
उस पावन जल में...


दूर क्षितिज तक जाएगी...
तुम्हारे प्रताप से... !! 


3 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat 30 नवंबर 2015 को 1:21 pm  

आस की नैया
बहुत चली है तूफ़ानों में
ये अब है कि थकी हारी बैठी है...
सुस्ता ले कुछ पल
क्या पता फिर से चल पड़ेगी।

आस है तो जीवन है। .. जरुरी है जीने के लिए

बहुत सुन्दर

Manoj Kumar 1 दिसंबर 2015 को 10:06 am  

डायनामिक सुन्दर रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 1 दिसंबर 2015 को 12:11 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (02-12-2015) को "कैसे उतरें पार?" (चर्चा अंक-2178) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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