अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

फासला उनमें कई सदी का... !

रिश्ता एक सागर
और नदी का... 


फासला उनमें कई सदी का... !


कितने अवरोध हैं मार्ग में... ?
जाने कितनी यात्रा शेष है... ??
आशाओं के बचे मात्र अवशेष हैं... !!


हतोत्साहित मन
और रीता हुआ पात्र है...
तभी गूंजता है एक स्वर--
समय एक इकाई मात्र है...


तय हो जायेंगे रास्ते
कि कायम रहेगा संघर्ष ज़िन्दगी का
भले, होने को हो, फासला उनमें कई सदी का... !!


3 टिप्पणियाँ:

Onkar 14 नवंबर 2015 को 6:10 am  

सही कहा

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 14 नवंबर 2015 को 11:39 am  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-11-2015) को "बच्चे सभ्यता के शिक्षक होते हैं" (चर्चा अंक-2161)    पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
बालदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

जमशेद आज़मी 15 नवंबर 2015 को 4:11 am  

क्‍या बात है। बहुत खूब। सुंदर पोस्‍ट की प्रस्‍तुति। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

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आज कैसे
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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