अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो अपने ही साये थे... !!

इंसानों की बस्ती
पूरी की पूरी खाली थी...
उस जमी हुई भीड़ में
सब पराये थे...


आज वो
सब अजनबी थे...
कल जिनके अपनेपन पर
हम भरमाये थे...



काँप गया मन
जिन आहटों से...
देखा तो जाना
वो अपने ही साये थे...



मोड़ आ गया
चलते चलते...
बादल
बेतहाशा छाये थे...



भींगे हुए थे भीतर से आकंठ
और क्या भींगते
उस अनमनी सी बारिश में...
इससे पहले की बरसता आकाश
हम अपनी छत के नीचे
लौट आये थे... !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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