अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उस एकांत में... !!

वो एक पुल था
आंसुओं से निर्मित
उस से होकर
पहुंचा जा सकता था
उन प्रांतरों तक...


जहाँ तक पहुंचाना
किसी ठोस स्थूलता के
वश की बात नहीं... !


सूक्ष्म एहसासों तक
पहुँचते हुए
हम पीछे रह जाते हैं...
वहां पहुँचते हैं वही सार तत्व
जो रूह के
हिस्से आते हैं...


उस एकांत में
हर पहचान धुंधली है...
हमने मौन
आँखें मूँद ली है... !!


1 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat 23 नवंबर 2015 को 9:06 am  

बहुत सुन्दर ...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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