अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

याद एक बिसरी सी... !!

राम
मन मन्दिर विराजें,
मन के आँगन से
रावण निर्वासित हो जाये...
दीपों के
झिलमिल प्रताप से
दृष्ट-अदृष्ट हर कोना
सुवासित हो पाये... !!


यूँ जले
कि मन प्राण
रोशन कर जाये...
लौ की
महिमा के गीत
सृष्टि मुक्तकंठ गाये... !!


यादों के गलियारे से
कोई पुरानी
मनभावन सी
झालर झिलमिलाये...
सकल रचनात्मकता से सज्जित
बचपन का वो " दिवाली घर "
मन के धरातल पर
नवीन हो जाये... !!



4 टिप्पणियाँ:

Onkar 11 नवंबर 2015 को 10:55 am  

बेहतरीन प्रस्तुति

राजेंद्र कुमार 11 नवंबर 2015 को 12:22 pm  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये।

Dilbag Virk 11 नवंबर 2015 को 1:38 pm  

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 12-11-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2158 पर की जाएगी |
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
धन्यवाद

yashoda Agrawal 11 नवंबर 2015 को 11:03 pm  

दीप पर्व की शुभकामनाएँ ..आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 12 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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मेरे आँगन में...
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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