अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उस नीले एकांत में... !!



कभी तुम देखना समंदर...


समंदर देखती हुई
तुम्हारी आँखों की छवि
हम उकेरेंगे...


लहरों का आना-जाना थाहती
तुम्हारी नज़रों की नमी
लिखेंगे...


एकटक तकते हुए उस छोर का आसमान
तुम हो जाओगे उस नीले रंग में लीन...

वह आसमानी रंग
समंदर के नीलेपन में सिमटता हुआ
तट को खारा कर जायेगा...

शाम के ऐसे धुंधलके में
किनारों का उदास कोई संगीत
उभर आएगा...


फिर...
तट से टकराती लहरों के उस शोर में...
हम मौन की सीपियाँ चुनेंगे...


उस...
नीले एकांत में...
कविता के अर्थ गुनेंगे...


तुम देखते रहना समंदर...
निर्निमेष...
लहरों पर टिकी आँखें...
उन आँखों में यादें अशेष...


बसा हुआ दर्द का देश... !!


2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 6 नवंबर 2015 को 11:52 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-11-2015) को "एक समय का कीजिए, दिन में अब उपवास" (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मन के - मनके 7 नवंबर 2015 को 9:42 am  

सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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