अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आत्मसंवाद... ?!!


लेखनी!
जो लिखो तो...
बूंदें लिखना...
आँख का पानी लिखना...


और लिख कर
उस लिखे से मुक्त हो जाना...
हुनर ये पेड़ों से सीखना
क्या होता है जीवन कहलाना... !!


कभी निकलना निर्जन पथ पर...
तो एहसासों के सूखे पत्ते चुनते चलना...
कि फिर नहीं होगा इस राह से कभी गुजरना...



उस तक फिर लौट आने की बात बस एक छलावा है
है बस ये मन का बहलाना...
सींचती हुई चलती है ज़र्रे ज़र्रे को, नदिया से सीखना
क्या होता है जीवन कहलाना... !!


कभी गिर पड़ना जो अनजाने ही...
तो दोष अपने सर ही मढ़ना...
यहाँ जीवन के अरण्य में लिखा हुआ अभी कितना कुछ अनचाहा है पढना...


सब देखते, सुनते, समझते हुए
हृदय के चहुँ ओर एक सुरक्षात्मक घेरा बनाना...
कोई भी आहत कर जाए, ऐसा न हो मन, हतोत्साहित न हो, कि...
सीखते सीखते ही सीखेंगे क्या होता है जीवन कहलाना... !!


1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 14 नवंबर 2015 को 12:17 pm  

लिखने का
न लिखने का
जीने का
न जीने का उत्तरदायित्व खुद लेना
लिखते जाना - वही ज़िन्दगी है

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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