अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

भींगी हुई वसुंधरा है... !!

सुनो...
सर्दी के मौसम के लिए
भारी-भरकम कपड़ों के साथ
कुछ रौशनी भी निकाल लेना...


सहेजी है न... ???


बीते दिनों आँखों भर भर सूरज था...
आधी रात के सूरज का कैसा अद्भुत गौरव था...


सब सहेज रखा है न ???
इस मौसम के लिए--


जब बादलों से पटा अम्बर है...
रिमझिम जाड़े की बारिश है...
भींगी हुई वसुंधरा है...


जीवन सचेत ठिठका खड़ा है...


कि उसने
अभी-अभी विदा किया है
सूखे पत्तों को...
अभी अभी बीता है मुरझाना उपवन का,
गमले से अलग होते देखा है
अभी-अभी फूलों को...


सिमटे हुए अंधेरों में
दीप जलाती है कविता...
धीरे-धीरे बात सहज
दोहराती है कविता--


सुनो,
ज़रा सी रौशनी भी
निकाल लेना...
भींगा-भींगा मन भी है,
बाती एक भावों में भिंगो कर जला लेना... !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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