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भींगी हुई वसुंधरा है... !!
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक
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12 नवंबर 2015
सुनो...
सर्दी के मौसम के लिए
भारी-भरकम कपड़ों के साथ
कुछ रौशनी भी निकाल लेना...
सहेजी है न... ???
बीते दिनों आँखों भर भर सूरज था...
आधी रात के सूरज का कैसा अद्भुत गौरव था...
सब सहेज रखा है न ???
इस मौसम के लिए--
जब बादलों से पटा अम्बर है...
रिमझिम जाड़े की बारिश है...
भींगी हुई वसुंधरा है...
जीवन सचेत ठिठका खड़ा है...
कि उसने
अभी-अभी विदा किया है
सूखे पत्तों को...
अभी अभी बीता है मुरझाना उपवन का,
गमले से अलग होते देखा है
अभी-अभी फूलों को...
सिमटे हुए अंधेरों में
दीप जलाती है कविता...
धीरे-धीरे बात सहज
दोहराती है कविता--
सुनो,
ज़रा सी रौशनी भी
निकाल लेना...
भींगा-भींगा मन भी है,
बाती एक भावों में भिंगो कर जला लेना... !!
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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"
इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!
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तुम्हारे प्रताप से... !!
सात वर्ष हुए, हमने शुरू किया था साथ चलना... !!
वो अपने ही साये थे... !!
उस एकांत में... !!
है नमी तो नहीं कोई कमी... !!
तुम तक... !!
जीवन ठिठका खड़ा है... !!
दूरियां मात्र आभास हैं... !!
जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!
आत्मसंवाद... ?!!
फासला उनमें कई सदी का... !
भींगी हुई वसुंधरा है... !!
याद एक बिसरी सी... !!
अँधेरी रात में वो भोर हो लेता है... !!
दीप, तुम्हारे संघर्ष के कितने वितान... !!
नमी के अनगिन टुकड़े और हम... !!
नीर नयनों में भर आये... !!
हार की जीत... !!
कितनी उदास शाम है... !!
... कि, जब होकर भी सुबह नहीं होती... !!
यूँ ही तो होगी न... !!
उस नीले एकांत में... !!
कि गला था रुंधा हुआ... !!
अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर चिट्ठियां... !!
हम सुनते रहे, गुनते रहे... !!
अब रंग श्वेत है... !!
ये फ़लक भी मन जैसा है... !!
बहते जाना है... !!
अंततोगत्वा सब माटी है... !!
मन के किसी कोने में... !!
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