अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नीर नयनों में भर आये... !!

नीर
नयनों में भर आये...
दीप जब
बुझने को आये...


कितने कितने बीते क्षण
गूँज उठे...
यादों के
कितने विम्ब छलछलाये...


अपने आयुष्य भर
जलता है...
फिर यादों में
रह जाता है...


लौ को
धारण करने वाली काया का
प्रस्थान निश्चित...
समय की धारा में
सब बह जाता है...


क्षणभंगुरता की महिमा के
शाश्वत कुछ अंश झिलमिलाये...
नीर
नयनों में भर आये... !!

4 टिप्पणियाँ:

अर्चना चावजी Archana Chaoji 7 नवंबर 2015 को 4:23 pm  

... मन भर आया ...

ब्लॉग बुलेटिन 7 नवंबर 2015 को 4:23 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज का पंचतंत्र - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रश्मि शर्मा 7 नवंबर 2015 को 7:40 pm  

Bahut sundar..man ko chhu gayi kavita

Rushabh Shukla 8 नवंबर 2015 को 7:24 am  

सुन्दर रचना .........

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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