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अनुशील
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नीर नयनों में भर आये... !!
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक
at
7 नवंबर 2015
नीर
नयनों में भर आये...
दीप जब
बुझने को आये...
कितने कितने बीते क्षण
गूँज उठे...
यादों के
कितने विम्ब छलछलाये...
अपने आयुष्य भर
जलता है...
फिर यादों में
रह जाता है...
लौ को
धारण करने वाली काया का
प्रस्थान निश्चित...
समय की धारा में
सब बह जाता है...
क्षणभंगुरता की महिमा के
शाश्वत कुछ अंश झिलमिलाये...
नीर
नयनों में भर आये... !!
3 टिप्पणियाँ:
Archana Chaoji
7 नवंबर 2015 को 4:23 pm बजे
... मन भर आया ...
रश्मि शर्मा
7 नवंबर 2015 को 7:40 pm बजे
Bahut sundar..man ko chhu gayi kavita
Rishabh Shukla
8 नवंबर 2015 को 7:24 am बजे
सुन्दर रचना .........
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इस ब्लॉग के बारे में
"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"
इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!
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तुम्हारे प्रताप से... !!
सात वर्ष हुए, हमने शुरू किया था साथ चलना... !!
वो अपने ही साये थे... !!
उस एकांत में... !!
है नमी तो नहीं कोई कमी... !!
तुम तक... !!
जीवन ठिठका खड़ा है... !!
दूरियां मात्र आभास हैं... !!
जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!
आत्मसंवाद... ?!!
फासला उनमें कई सदी का... !
भींगी हुई वसुंधरा है... !!
याद एक बिसरी सी... !!
अँधेरी रात में वो भोर हो लेता है... !!
दीप, तुम्हारे संघर्ष के कितने वितान... !!
नमी के अनगिन टुकड़े और हम... !!
नीर नयनों में भर आये... !!
हार की जीत... !!
कितनी उदास शाम है... !!
... कि, जब होकर भी सुबह नहीं होती... !!
यूँ ही तो होगी न... !!
उस नीले एकांत में... !!
कि गला था रुंधा हुआ... !!
अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर चिट्ठियां... !!
हम सुनते रहे, गुनते रहे... !!
अब रंग श्वेत है... !!
ये फ़लक भी मन जैसा है... !!
बहते जाना है... !!
अंततोगत्वा सब माटी है... !!
मन के किसी कोने में... !!
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3 टिप्पणियाँ:
... मन भर आया ...
Bahut sundar..man ko chhu gayi kavita
सुन्दर रचना .........
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