मैंने अपने शहर की बारिश भेजी
तस्वीर में उतार कर
उसने उसे अपने शहर की बारिश सा पहचाना
मैंने चाँद भेजा
अपने हिस्से के आकाश का
वही चाँद उसके यहाँ भी चमकता है उसके हिस्से के आकाश पर...
मैंने उगता दिनमान भी भेजा
वो भी उसके यहाँ के सूरज सा ही था...
बल्कि वही था...
एक सी ही बूँदें हैं जो भिंगोती है हमें
एक ही वो सूरज है जिसे अर्घ्य देते हैं हम अपने अपने हिस्से की धरती से
एक ही है वो चाँद जिसपे नज़रें टिकाये आकाश का विस्तार निहारा करते हैं हम
उसका मन उदास होता है
यहाँ पूरा हृदयाकाश बादलों से आच्छादित हताश होता है
अनायास नम हो जाता है हृदयतल
बूंदों ने कल भी भिंगोया था आज भी हैं भींगे हुए ही पल
दूरियां
मात्र आभास हैं...
एक ही सिक्के के दो पहलू-- "सुख-दुःख" जैसे आपस में सगे हैं
वैसे ही, उतने ही हम भी सगे हैं, पास पास हैं... !!
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