अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जीवन ठिठका खड़ा है... !!

इन दिनों कुछ भी ठीक नहीं है...


विदा हो चुके पत्ते
अपने पीछे, पेड़ को, सिसकता तड़पता छोड़ गए हैं...


शीत लहर चलने लगी है...
ठिठुरन है माहौल में...


जीवन ठिठका खड़ा है...
अनहोनियों की आशंकाएं हवा में तैर रही हैं...


ये कैसा समय है... ??
मूलभूत इंसानी जज़्बात
अपनी प्रामाणिकता खो चुके हैं... ?!!


जिसपर टिकी हुई थी दुनिया
विश्वास जैसे शब्द
अब जैसे बीते दिन की बात हो चुके हैं... ?!!


ऐसे में जीवित हैं हम,
यही क्या कम है... !

फिर भी, संभावनाओं का आकाश, रीता नहीं है
कि आँखें अभी भी नम हैं... !!


कितना कुछ
कहते कहते रुक जाते हैं...
निराश माहौल में भी, ज़रा कविता में चलिए
आस विश्वास की ओर झुक जाते हैं...


और पूरी प्रतिबद्धता से कहते हैं--


कि...
ये क्षण भर की बात है...
परिवेश बदलेगा...


"कुछ भी ठीक नहीं है" कहना ठीक नहीं...
चलो कहते हैं--
हमारे साझे प्रयास से, जीवन सूर्य, अंधेरों से निकलेगा... !!



4 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय 21 नवंबर 2015 को 4:26 am  

आमीन।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 21 नवंबर 2015 को 11:35 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-11-2015) को "काँटें बिखरे हैं कानन में" (चर्चा-अंक 2168) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 21 नवंबर 2015 को 3:58 pm  

बहुत सुन्दर

JEEWANTIPS 22 नवंबर 2015 को 5:31 am  

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

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