अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!


आँखों में कुछ नहीं था...
सपने टूटे हुए थे...
गड़ते थे...


कितनी सुन्दर व्यवस्था की है प्रकृति ने...
आँसूओं में घुल गए सारे टुकड़े
बह गए...


आँखें अब खाली थीं...
किसी भी आशा किसी भी सपने से कहीं दूर
निस्तेज स्पन्दनहीन...


लगता था...


शायद अब नहीं उगेगी भोर
नहीं बसेगा वहां सपना कोई और 


फिर
एक क्षण ऐसा आया...
चमत्कृत हुई आँखें
सपनों को अनायास वहां पलता पाया...


उन्हें जाने कौन बो गया था...
जीवन मौन ही मौन घटित हो गया था... !!


3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 19 नवंबर 2015 को 6:21 am  

जब बहुत कुछ बह जाता है, फिर शेष विशेष होकर आँखों में अंदर ही अंदर तैरता है
जीवन के प्राकृत गूढ़ मायनों को संजोने लगता है
बाहर से शुष्क लगता चेहरा जानता है - दर्द रोने से कम नहीं होगा
नहीं देना चाहता उन्हें सुकून, जो रुलाने की ख्वाहिशों में चलते हैं
खुद को हमदर्द कहते हैं

राजेंद्र कुमार 19 नवंबर 2015 को 7:17 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (20.11.2015) को "आतंकवाद मानव सम्यता के लिए कलंक"(चर्चा अंक-2166) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

प्रतिभा सक्सेना 21 नवंबर 2015 को 6:31 pm  

वाणी मौन रह जाती है - नयनों की भाषा व्यंजित कर देती है !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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