अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यूँ ही तो होगी न... !!


दुनिया है...
यूँ ही तो होगी न...


सतही ही होगा अधिकांश तत्व...
जो मिलेंगे वो सब नहीं होने हैं सागर...
स्वभावतः छलकेगा, छलकता ही है गागर...


इस उथले स्वभाव से
कैसी निराशा...
फिर कैसा क्रोध...


उचित है बस मुस्कुरा कर
कर लेना किनारा...
यहाँ तो पल पल चलना है विरोध...


कि...


दुनिया है...
यूँ ही तो होगी न...


लोग हैं...
ऐसे ही तो होंगे न...


समय का फेर है
सब अच्छा ही अच्छा हो, ये दुर्लभ है, आश्चर्य है...
बुराई तो अकड़ी बैठी ही है, इसमें क्या आश्चर्य है... !!



1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 6 नवंबर 2015 को 10:49 am  

विरोध से गरजता है सागर
लरजता है सागर
गागर को छलकने दो
तभी तो जानता है हर कोई
क्या है सागर !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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