अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हम सुनते रहे, गुनते रहे... !!

खिल आते हो...
नेह बढ़ाते हो...
फिर सब वीरान कर चले जाते हो...


कहो कैसा ये व्यवहार... ?


फूल बोल उठे :
यही जगत आधार !


बहती हो...
जाने क्या कहती हो...
लौ को कितनी बार बुझाती हो...


कहो ये तुम्हारे कैसे सरोकार... ?


हवा कह उठी :
मैं अपने प्राकृत स्वभाव से लाचार !


अटल खड़े हो...
कब से अड़े हो...
धरा के आँचल में कब से जड़े हो...


रास्ता देते नहीं, तेरे ये कैसे संस्कार... ?


पर्वत बोल उठे :
अचलता मेरा श्रृंगार !


बहती जाती हो...
कौन से गीत गाती हो...
क्या लिए मन में सागर में समाती हो...


खो जाता है तुम्हारा संसार... ?


नदिया बोल उठी...
मेरी यात्रा का यही पारावार !

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हम सुनते रहे...
गुनते रहे...
कुछ यूँ ही  बुनते  रहे :


ये कितने प्रतिबद्ध हैं न
स्पष्ट, पारदर्शी, साकार...


इंसान ही है जो है इतना
दिगभ्रमित, छली, लाचार... ? !!

1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 4 नवंबर 2015 को 6:03 am  

इंसान नकल में ही रह जाता है
प्राकृतिकता से अलग कृत्रिम होता जाता है

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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