अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बहते जाना है... !!

धाराओं का खेल था...
दो किनारों का क्षितिज पर मेल था...


जीवन चलता ही रहा...
सूरज नित निकलता नित ढलता ही रहा...


कि जलते जाना है बाती को...
नदिया को बहते जाना है...


पड़ाव होंगे राह में...
पर वो भी ठहर जाने के पक्षधर नहीं...
कि उद्देश्य बस चलते जाना है...


नदिया हो या हो जीवन...
उसे अनंत तक बहते जाना है... !!

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इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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