अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम तक... !!

सजल आँखों से जलाया
देहरी पर एक दीप...


मन का आँगन
लिया पहले ही था लीप...


बड़े स्नेह से बुला रहे हैं
ज़िन्दगी ! आओ न समीप...


हम भी तुम तक ही तो आ रहे हैं
चुनते हुए भावों के मोती सीप... !! 


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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