अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कि गला था रुंधा हुआ... !!


कहते कहते रुक गए...
कि गला था रुंधा हुआ...


कौन सा दर्द  ये...
आज यूँ ज़िन्दा हुआ...


चोटें लगती हैं अक्सर...
तो घाव भी भर जाते हैं...


जो  खो गए इस  मौसम में...
वो फूल यादों में मुस्कुराते हैं...


आँखों में
झिलमिल उदासी छाई है...
एक घटा सी
घिर आई है...


जो घिर आई है
तो बरसेगी उदासी...
कोई बड़ा सन्दर्भ नहीं
बात ये ज़रा सी... !!

2 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 5 नवंबर 2015 को 5:49 am  

कई बार ओस का टुकड़ा
पलकों से गुफ्तगू करने लगता है
अंदर कुछ बेचैनी होती है
आँखों से गंगा बहने लगती है …
किसका दर्द अपना हुआ
पता भी नहीं चलता
बेवजह कितना कुछ याद आने लगता है !
छूटते स्टेशन से जो चेहरे ओझल होते हैं
किसी स्टेशन पर जो उत्तर जाते हैं
वे भी अनजाने याद आते हैं

प्रियंका गुप्ता 5 नवंबर 2015 को 4:17 pm  

ये उदासी बरस के बस मन भिगो जाती है न...?
बेहद मर्मस्पर्शी पोस्ट...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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