कई बार ओस का टुकड़ा पलकों से गुफ्तगू करने लगता है अंदर कुछ बेचैनी होती है आँखों से गंगा बहने लगती है … किसका दर्द अपना हुआ पता भी नहीं चलता बेवजह कितना कुछ याद आने लगता है ! छूटते स्टेशन से जो चेहरे ओझल होते हैं किसी स्टेशन पर जो उत्तर जाते हैं वे भी अनजाने याद आते हैं
2 टिप्पणियाँ:
कई बार ओस का टुकड़ा
पलकों से गुफ्तगू करने लगता है
अंदर कुछ बेचैनी होती है
आँखों से गंगा बहने लगती है …
किसका दर्द अपना हुआ
पता भी नहीं चलता
बेवजह कितना कुछ याद आने लगता है !
छूटते स्टेशन से जो चेहरे ओझल होते हैं
किसी स्टेशन पर जो उत्तर जाते हैं
वे भी अनजाने याद आते हैं
ये उदासी बरस के बस मन भिगो जाती है न...?
बेहद मर्मस्पर्शी पोस्ट...
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