अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अब रंग श्वेत है... !!

आस की जलती लौ...
और आंसुओं के सहारे...
कितने मोड़ यूँ ही कर लिए गए पार...


हर बार
अदृश्य शक्तियों द्वारा
थाम ली गयी पतवार... !


हर बार लिखते हुए आंसू...
नम हुई जब नोक कलम की...


तो उस नमी से भी
रंगों की ही सम्भावना जन्मी 


ठीक वैसे ही
जैसे बूंदों के बीच से...
इन्द्रधनुष नज़र आता है...


श्वेत वर्ण
सात रंगों में...
विभक्त हो जाता है...


मिल गए फिर सब
अब रंग श्वेत है...
ऐसे कैसे रीत जाएगी
भले ज़िन्दगी हाथों से फिसलती हुई रेत है... !!

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 नवंबर 2015 को 11:44 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (05-11-2015) को "मोर्निग सोशल नेटवर्क" (चर्चा अंक 2151) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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