अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितनी उदास शाम है... !!

कितनी उदास शाम है...


उदासी नयी बात नहीं है...
इसमें भी कुछ नया नहीं
कि खुद ही खुद को समझा कर
थोड़ा सा और मन को उलझा कर
लौट जाएगी
शाम...


नया कुछ भी नहीं...
फिर भी हर शाम
बीती  उदासी की पुनरावृत्ति होती हुई भी
हर बार अपने आप में मौलिक है...


और
ये भी एक सच है
कि हमारे बीच की दूरियां
मात्र भौगोलिक हैं...


कि मीलों दूर भी शाम वैसी ही उदास है...
वैसा ही उधर भी भावशून्य आकाश है...


समस्त रहस्य समेटे हुए शाम दिवस के पास है... !!

3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 6 नवंबर 2015 को 3:06 pm  

सूर्यास्त के साथ सबकुछ एक विराम में लौटने लगता है
शाम कुछ देर के लिए आती है
शयद इसीलिए उदास सी उदास कर जाती है

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 नवंबर 2015 को 1:50 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (08-11-2015) को "अच्छे दिन दिखला दो बाबू" (चर्चा अंक 2154) (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar 8 नवंबर 2015 को 6:30 pm  

कि मीलों दूर भी शाम वैसी ही उदास है...
वैसा ही उधर भी भावशून्य आकाश है...

समस्त रहस्य समेटे हुए शाम दिवस के पास है... !!

सच कहा और सुंदर कहा।

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आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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