अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर चिट्ठियां... !!

पतझड़ भी
अपनी सुषमा में...
वसंत सा प्रचुर...


उड़ते हुए सूखे पत्ते...
जैसे चिट्ठियां हों...
अपने गंतव्य तक पहुंचने को आतुर...


रंग बिरंगे स्वरुप में...
संजोये हुए कितने ही सन्देश...
आकंठ समोये कहे-अनकहे कितने ही भाव...


यात्रारत...
क्षत विक्षत... !


कहाँ पहुंचेंगे... ?
क्या कोई पढ़ेगा भी लकीरें... ?


क्या होगी परिणति... ?


इन सब बातों को कर परे...
पत्ते आकाश नापने चले... !!


देखना!
दिखें तो उन्हें पढ़ लेना...


उन रंगों ने
अदृश्य लिपि में
भावों को श्रृंखलाबद्ध किया है...


अपने अनुरूप अर्थ कोई
हो सके तो
तुम भी गढ़ लेना... !!

4 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 4 नवंबर 2015 को 6:22 pm  

एक उड़ता हुआ पत्ता मुझ तक भी आये
चिट्ठी की आस पूरी कर जाये …
पढ़ लूँगी वह सब जो तुमने कहा है
वह भी जो कहना चाहा है
गढ़ लूँगी सारे रूप
सहेजकर रख लूँगी

अनुपमा पाठक 4 नवंबर 2015 को 6:43 pm  

सब संदेशे आप तक पहुँचते ही हैं... आपकी लेखनी के स्वर में समाहित हो... हमारा मार्गदर्शण करने के लिए... !!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 5 नवंबर 2015 को 10:57 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-11-2015) को "अब भगवान भी दौरे पर" (चर्चा अंक 2152) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) 6 नवंबर 2015 को 8:23 am  

वाह...क्या खूब ..आपका लिखा हमेशा अलग सा होता

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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