अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

धमनियों में रक्त की तरह... !!

धमनियों में
रक्त की तरह...
तुम प्रवाहित हो मुझमें
चलायमान वक़्त की तरह...


तुम्हारे सान्निध्य में
जब भी होती हूँ
होती हूँ आद्यान्त
भक्त की तरह...


दर्द में
दवा होती हो
जब कराहती हूँ मैं
अशक्त की तरह...


कविते! कभी बांटना
अपने भी हृदय की पीर
हरदम औरों का दर्द गुनती हो
तठस्थ विरक्त की तरह...


मौन ओढ़े यूँ न रहना
दरख़्त की तरह...
धमनियों में यूँ ही
होते रहना प्रवाहित रक्त की तरह... !! 

1 टिप्पणियाँ:

प्रतिभा सक्सेना 10 अक्तूबर 2015 को 6:46 am  

जीवनी शक्ति के रूप में कविता को ग्रहण करना -सुन्दर संदेश है !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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