अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उसकी उपस्थिति ही दिशा का संज्ञान है... !!

एक खिड़की हो...


वहां से झांकता
समूचा आकाश हो...


उस पार
पूरी दुनिया हो


और
इस दुनिया में हों हम


उस दुनिया से
जुड़े हुए...
आकाश की ओर दृष्टि किये
ज़मीं की ओर मुड़े हुए... !!


चाहे वो कमरा हो
या हो मन का वितान...


और कुछ हो न हो वहां
एक खिड़की
अकाट्य रूप से हो विद्यमान... 


जहाँ से देखते हुए विस्तार,
भूल जायें हम,
स्वयं अपना भी नाम... !!


कि...
अपने छोटे से
अस्तित्व में,
वो
विराट की ओर खुलती
सम्भावना का नाम है...


कमरा हो या हो मन
खिड़की की उपस्थिति ही दिशा का संज्ञान है... !!




1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 28 अक्तूबर 2015 को 6:53 pm  

प्रभावशाली

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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