अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो चल रही थी... वो चलती रही... !!

वो चल रही थी

अपनी धुरी पर...
वो चलती रही... 


युगों युगों से है जल रही 


हमें शीतलता देने को
वो ख़ुशी ख़ुशी जलती रही... 


उसका संतुलन
उसकी गति
उसका धैर्य 


ये चूक न जायें
इसलिए ज़रूरी है हम थोड़ा झुक जायें 


है यही जीवन की गति
हर क्षण लगी हुई है कोई न कोई क्षति 


सब सहती हुई धरा करती है प्रयाण
धरती माँ! तुम्हारे धैर्य को कोटि कोटि प्रणाम !!






3 टिप्पणियाँ:

Digvijay Agrawal 7 अक्तूबर 2015 को 2:01 am  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 08 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रश्मि प्रभा... 7 अक्तूबर 2015 को 9:11 am  

धरती देती है
लिए को मूलधन की तरह लौटाती है
बिना किसी ख्याल के जब वह होने लगती है बंजर
लोग ! ईश्वर पर प्रश्न उठाते हैं

Anita 7 अक्तूबर 2015 को 10:38 am  

अति सुंदर..धरती माँ को शत शत नमन..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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