अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बात बस जरा सी... !!


कोहरा, कुंहासा, उदासी
बात बस जरा सी... !!


मन के मौसम सी
दूर छाई घटा भी रुआंसी... !! 


कैसा सुखद विरोधाभास है-


इन्द्रधनुषी आभा उसकी
बस नाम से वो उदासी... !!

कोहरे के पीछे से एक किरण झाँकेगी
बदल जायेगा परिदृश्य 


आकाश की सुषमा भी, होगी फिर धरा सी... !!
कोई बड़ा सन्दर्भ नहीं, ये बात बस जरा सी... !!!


4 टिप्पणियाँ:

Mukesh Kumar Sinha 17 अक्तूबर 2015 को 10:49 am  

बेहतरीन कविता

Onkar 17 अक्तूबर 2015 को 3:22 pm  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

ब्लॉग बुलेटिन 17 अक्तूबर 2015 को 5:55 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, दिमागी हालत - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Smart Indian 18 अक्तूबर 2015 को 4:46 am  

बहुत सुंदर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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