अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सागर किनारे... !!











बहता पानी...
अपने साथ सारे दोष दंश बहा ले जाता है...


जब उमड़ घुमड़ रहीं हों
मन के प्राचीरों में दुविधाएं...
लहरों का आना जाना उद्वेलित कर रहा हो
घेरे हुए हो अनेकानेक बाधाएं...


तो किसी ताल तलैया नदी पोखर या सागर किनारे
कुछ पल विश्राम करना चाहिए...


समस्त विध्वंसक प्रवृतियों के बीच
कुछ क्षण सृजन का अभिराम होना चाहिए...


कैसे किरण जल पर नाचती हुई
नीले विस्तार की कथा कहतीं है...
कैसे तट से टकराते पानी के शोर में
कतरा कतरा ज़िन्दगी की व्यथा बहती है...


नित घटित हो रही संभावनाओं का
सुकंठ गान होना चाहिए...


समस्यायों के सागर में
विसंगतियों की भीड़ में
प्रश्नों के इस जंगल में... 


तुम सा समाधान होना चाहिए...


कुछ क्षण सृजन का अभिराम होना चाहिए... !!

3 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 8 अक्तूबर 2015 को 12:55 pm  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.10.2015) को "किसानों की उपेक्षा "(चर्चा अंक-2124) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

रचना दीक्षित 9 अक्तूबर 2015 को 9:29 am  

समस्यायों के सागर में
विसंगतियों की भीड़ में
प्रश्नों के इस जंगल में...
तुम सा समाधान होना चाहिए...
कुछ क्षण सृजन का अभिराम होना चाहिए... !!

सुंदर कविता.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 9 अक्तूबर 2015 को 12:44 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-10-2015) को "चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" (चर्चा अंक-2125) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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