अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

स्याही से स्वर तक... !!

स्याही से स्वर तक...
मौन से असर तक...


बिखरी हैं
संभावनाएं...
धरती की गोद से
बादलों के घर तक...


प्रेरणा
किसी एक पल की...
ढ़ल जाती है कविता में
सहर तक...



रौशनी की आस में
कई बार जागती हैं

निर्निमेष आँखें...

रात्रि के अंतिम पहर तक...


एक सफ़र से
दूसरे सफ़र तक...
ज़िन्दगी अन्यान्य मोड़ों से गुजरती है
टूटते कहर तक...


संघर्ष का होता रहता है आगाज़
घटित होते रहते हैं अंजाम...
कर दरकिनार

कितने ही अगर मगर का फ़लक...


स्याही से स्वर तक...
मौन से असर तक...

शब्द भाव
विचरते हैं
अपने अंदाज़ में...
संकरी गलियों से विस्तृत डगर तक...

रथ पर सवार
बाल अरुण...
अपने समस्त वैभव के साथ
उपस्थित है दूर फ़लक...

ये सिलसिला
चल रहा है
सदियों से...
ये चलता रहेगा सदियों तक... !!






2 टिप्पणियाँ:

Onkar 11 अक्तूबर 2015 को 7:40 am  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

देवेन्द्र पाण्डेय 11 अक्तूबर 2015 को 11:14 am  

यह सिलसिला चलता रहेगा सदियों तक।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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