अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

...तो पा जाते "विवेक" !!

इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती...


काश, जो सुसुप्त विचारों में
चिरप्रतीक्षित
हलचल हो पाती...


विचार ही
परिणत होते हैं
कर्म में...


नीयत परिलक्षित होती है
बातों के
मर्म में...


दिल से लिखी
दिल की लिखी
दिमाग तक जो पहुँचती पाती...


इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती... 


प्रश्न ढ़ल जाते
उत्तर के
वर्ण में...


जीवन इतना बेबस नहीं होता
रोज़ रोज़ के
घटनाक्रम में...


थोड़ा अपने भीतर हम जा पाते
तो पा जाते "विवेक"
जो है बिसरा दिया गया साथी...


निश्चित ही फिर--


इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती... ... !!


सूरज की किरणों के साथ, ज़िन्दगी भी मुस्काती... !!!








3 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 10 अक्तूबर 2015 को 1:17 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-10-2015) को "पतंजलि तो खुश हो रहे होंगे" (चर्चा अंक-2126) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 10 अक्तूबर 2015 को 5:22 pm  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

Anita 11 अक्तूबर 2015 को 8:31 am  

बहुत सुंदर प्रार्थना..

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