अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पतझड़ साक्षी है, फूलों के मौसम लौट आयेंगे... !!

तुम देखना 


एक समतल भूमि होगी
कहीं दूर अवश्य...


उबड़-खाबड़ राहों से गुज़र कर

हम जिस तक पहुंचेंगे... !



कहीं होगा
एक बित्ता आसमान...
जो तुम्हारी मेरी छत पर
आधा-आधा होगा...


हमने बांटे होंगे तब तक
अनगिन खुशियाँ और गम...
यूँ जीवन की दुर्गम राहों को
नेह के धागों ने साधा होगा... !


तुम देखना


कविता के आँगन में
काँटों के बीच मुस्कुराती कली मिलेगी...


कहीं होगी वहीँ
घास पर
ओस की धवल बूँदें...


आंसू और ओस की नमी
महसूस करना कविता में
आँखें मूँदे...


ओस और आंसू
घुल कर स्याही में
साथ की एक अनूठी परिभाषा रच जायेंगे...
पतझड़ साक्षी है, फूलों के मौसम लौट आयेंगे... !!



2 टिप्पणियाँ:

yashoda Agrawal 29 अक्तूबर 2015 को 11:33 am  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 30 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रश्मि प्रभा... 29 अक्तूबर 2015 को 3:54 pm  

भावों की रिमझिम बारिश होगी
आधा आधा आसमान पूरा हो जायेगा …

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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