अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आत्मसंवाद... ?!!

सही गलत
अच्छा बुरा
सत्य असत्य
उचित अनुचित


ये निर्णय ही दुष्कर है...
और शायद ऐसा कोई तर्क-वितर्क...
ऐसा कोई निर्णय
अनिवार्य भी नहीं...


कि संयत मन हो...
उसके दिशानिर्देश पर चलने का उपक्रम हो...


तो राहें खुल जाती हैं...
दुनिया का काम है वो रोड़े अटकाती है 


तो ये कभी भी किसी सूरत में
हताशा का कारण न हो...
कि ऐसी कोई उलझन नहीं जहां में
जिसका कोई निवारण न हो...


ऐसे क्षण आयेंगे जब टूटा सा होगा विश्वास
देखना, कविता फिर भी होगी पास 


वही गुनगुनायेगी...
दीप नए जलाएगी... !!

6 टिप्पणियाँ:

Kaushal Lal 31 अक्तूबर 2015 को 4:16 am  

बहुत सुंदर ......

Onkar 31 अक्तूबर 2015 को 5:40 am  

बहुत सुंदर

रश्मि प्रभा... 31 अक्तूबर 2015 को 6:47 am  

आत्मसंवाद तभी होता है
जब अर्जुन गांडीव नीचे रख देता है …
कृष्ण का रूप धर आत्मा
दिशा निर्देशेित करती है
जहाँ कोई तर्क नहीं, बस आगत को पाने का उपक्रम होता है

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 31 अक्तूबर 2015 को 1:27 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-11-2015) को "ज़िन्दगी दुश्वार लेकिन प्यार कर" (चर्चा अंक-2147) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

जमशेद आज़मी 1 नवंबर 2015 को 8:07 am  

बहुत ही सुंदर रचना की प्रस्‍तुति।

हिमकर श्याम 1 नवंबर 2015 को 12:38 pm  

सुन्दर और भावपूर्ण

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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