अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दिया और बाती के अंक में... !!











ये कुछ समय पुरानी तस्वीर है किसी सुबह की... सुबह की भागम भाग में नज़र पड़ी होगी... क्लिक कर लिया होगा इस क्षण को... फिर वो क्षण भी खो गया और तस्वीर भी विस्मृत हो गयी... ! विस्मृति की धूल जाने कैसे आज सिहराती हुई हवा ने उड़ा दिया और यह तस्वीर प्रकट हो गयी मेरे सामने जैसे दे रही हो सुबह का मनोरम सन्देश अपनी धीमी आहटों से... 


आहटों के इंतज़ार में
रात ठिठकी खड़ी थी...


आँखों में आशान्वित
आंसुओं की लड़ी थी...


ऐसे में एक सुबह
तस्वीर में मुस्कुरायी...


रात के अंधेरों को जीतती
दिए की लौ जगमगायी...


उस लौ में मेरे मन ने
ईश्वर! तुम्हें देख लिया...


दिया और बाती के अंक में
प्रदीप्त था जीवन का लेख नया... 


उसे पढ़ कर, गुन कर, सुन कर
चल दिए अकेले पथ पर...


जाने कितना सफ़र शेष है
जाने किस क्षितिज पर लुप्त दिवाकर... !! 


2 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 29 अक्तूबर 2015 को 7:35 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Asha Joglekar 30 अक्तूबर 2015 को 10:44 pm  

सुंदर।

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कुछ बातें अनूठी है!
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