अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वह तो हरदम से है कहती आयी... !!

देखा था तुम्हें
एक रोज़
एक झलक भर...


देखेंगे तुम्हें
एक रोज़
जी भर कर... 


मिलोगी न... ??
कहो ज़िन्दगी... !!


ज़िन्दगी
इस प्रश्न पर
मुस्कुरायी...
वह तो
हरदम से है
कहती आयी-- 


साथ ही हूँ
साथ ही होती हूँ
तुम भूल जाते हो...


अपने साए को ही
ढूंढ़ते हो, शून्य में
आवाज़ लगाते हो... 


शून्य से टकरा कर
जो लौट रहा है स्वर
उसे सुनो... 


इन दृश्यमान बाधाओं से परे
शुभ संकल्पों का
पावन संसार गुनो... 


जीवन भी
वहीँ मिलेगा,
ज़िन्दगी
सार्थक नाम लगेगी...


जो उजड़ी उदास
लगती है,
वही धरा
फिर पावन धाम लगेगी... !!


3 टिप्पणियाँ:

Onkar 3 अक्तूबर 2015 को 11:25 am  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 3 अक्तूबर 2015 को 2:04 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-10-2015) को "स्वयं की खोज" (चर्चा अंक-2118) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 4 अक्तूबर 2015 को 5:36 am  

बहुत सुंदर प्रस्तुति

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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