अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कोहरे में गुम होती आकृतियों में... !!

कई बार
समझ नहीं आता...
क्या सही है
क्या गलत... 


कई बार
वस्तुस्थिति यूँ हो जाती है जैसे...
आगे की राह पर
कभी न हटने वाली धुंध जमी हो...


कई बार यूँ भी हुआ है
कि कोहरा भयंकर होता हुआ
लील गया है समूचा विश्वास...


कई कई बार टूटे हैं सपने
कितनी ही बार रूठे हैं अपने


राह में
कितनी बार ठोकर लगी है
ये हिसाब रखना छूट गया है... !


चलते चलते हमने जाना
साथ चलता हुआ अपना ही विम्ब
हमसे जाने कब रूठ गया है... !!


युगों युगों के साथ का
वो निर्विवाद पक्षधर...
कभी मौन
तो कभी मुखर... 


विश्वास के धागे सुरक्षित हैं


उन्हीं धागों से बुन कर
संवादों का एक अदृश्य पुल...


हम रूठे हुए विम्ब को मना लेंगे...


कोहरे में गुम होती आकृतियों में
हम स्वयं को पा ही लेंगे... !!


3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 7 अक्तूबर 2015 को 10:57 am  

टूटने का सिलसिला
फिर से उसे जोड़ने की जद्दोजहद इतनी हुई
कि खुद ही खुद से निर्विकार हो गए

Anita 7 अक्तूबर 2015 को 11:30 am  

हर बार एक निराशा का भाव और फिर आशा का दामन थाम लेने की जिद..इंसान का मन ऐसा ही है..इसलिए कहीं पहुँचना नहीं होता..एक बार पूरी तरह से स्वयं को निराशा के अँधेरे में जो डूब जाने दे..पूरी तरह से..और कहीं भी कोई किरन दिखाई न दे...तब ही शायद ऐसा मार्ग मिलेगा जो सच्चा होगा..

Dilbag Virk 7 अक्तूबर 2015 को 3:37 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर

चर्चा - 2123
में दिया जाएगा
धन्यवाद

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