अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सफ़र पर... !!

बहुत सारी बेचैनियों को समेट कर
गठरी बाँध
जब हम चलते हैं सफ़र पर...


तो ये अतिरिक्त भार
हमें पहले ही थका देता है...


सफ़र की थकान
हृदय के बोझ

ये जीवन के उतार चढ़ाव में
साथ लेकर नहीं चले जा सकते... !


कहीं राह में एक बहता दरिया होता है...


जहाँ प्रवाहित कर देने होते हैं
पहाड़ से कष्ट...


सौंप देनी होती है बहती धारा को
बेचैनियों की गठरी...


कि...
बढ़ा जा सके आगे
चढ़ी जा सके
जीवन की दुर्गम चढ़ाई...


और आगे तय हो सके सफ़र... !!

3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 12 अक्तूबर 2015 को 7:57 pm  

बिना अतिरिक्त भार के चलने का मज़ा ही क्या ?
डूबकर उतराये नहीं तो अनुभव कैसा !
आदमी आदमियत में ऐसे ही चलता है …

Rahul... 13 अक्तूबर 2015 को 10:08 am  


सौंप देनी होती है बहती धारा को
बेचैनियों की गठरी...
....पर सफर समाप्त नहीं होता, चलता रहता है अपनी शालीन धमक के साथ.

Pallavi saxena 19 अक्तूबर 2015 को 8:31 am  

यदि उस अतिरिक्त भाव को धारा के हवाले न किया जाये तो शायद चलना ही दूभर हो जाएगा।

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