अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तो देर हो जाएगी... !!

तब
जब धरती
कितने ही कुचक्रों में फंसी


इंसानी फितरतों को
झेल रही है...
कुवृत्तियां सहज मानवीय प्रकृति से
खेल रही है...


दिशाहीन संवेदनाओं का
काफ़िला
दूर निकल गया है...
चट्टानों पर जमा
सदियों पुराना बर्फ़ भी
पिघल गया है...


तब
चारों दिशाओं को
चीख कर प्रतिकार करना होगा...
अनगिन सिरफिरी मानसिकताओं से
मुट्ठी भर विवेक को
एकजुट हो लड़ना स्वीकार करना होगा...


ऐसा होने में जो देर हुई
तो देर हो जाएगी...
सवेरा कहते हैं जिसे वो रौशनी
बस आँखों का सपना हो कर रह जाएगी... !!

2 टिप्पणियाँ:

Arun Roy 21 अक्तूबर 2015 को 2:44 pm  

अच्छी कविता

vijendra agrawal 21 अक्तूबर 2015 को 5:57 pm  

क्रान्तिकारी रचना..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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