अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चुटकी भर रौशनी ने... !!












हो दीप...
या हो टिमटिमाता सितारा...


उपस्थित वहीँ हैं 


है जहाँ अँधियारा... !!


विम्ब...
प्रतिविम्ब...


रूपक रौशनी के 


इनसे ही है उजियारा... !!


टिमटिमाती नन्ही सी लौ
क्षीण से हौसले 


और विराट अन्धकार 


फिर भी जीवन कभी नहीं हारा... !!


समेटी अँजुरी में चुटकी भर रौशनी
और बिखेर दिया जीवन के सुनसान में 


महक उठा समूचा अरण्य


चुटकी भर रौशनी ने जीत लिया अँधियारा... !!





2 टिप्पणियाँ:

Onkar 18 अक्तूबर 2015 को 1:35 pm  

बहुत सुंदर प्रस्तुति

Anita 19 अक्तूबर 2015 को 4:51 am  

तभी तो ऋषियों ने गया है..अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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