अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम उन्हें शब्द देना... !!

हम
आकाश धरा की
अनगिन छवियाँ सहेजेंगे...
ईश्वर!
तुम उन्हें
स्पंदित शब्द देना...


वो कोना
लुप्त है
जो संबल हुआ करता था...
उचित यही
खुद ही
वो कोना हो लेना...


हमें
हँसना है
कविता में...
भला है
कविता में ही
रो लेना...


वो अक्षर है
सकल प्रश्नों का
निर्द्वंद उत्तर है...
मन!
अपनी जमीं पर उसे
श्रद्धा के साथ बो लेना... 


उसका हो लेना... ...... ... !!



5 टिप्पणियाँ:

Anita 28 अक्तूबर 2015 को 10:50 am  

अति सुंदर..सकल प्रश्नों का एक वही तो उत्तर है..

Dilbag Virk 28 अक्तूबर 2015 को 3:06 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
धन्यवाद

रश्मि प्रभा... 28 अक्तूबर 2015 को 3:28 pm  

शब्दों में जी लेने का उपक्रम -
कविता कहो या कहानी

जयकृष्ण राय तुषार 28 अक्तूबर 2015 को 4:17 pm  

बहुत ही सुन्दर कविता |आभार

हिमकर श्याम 29 अक्तूबर 2015 को 9:15 am  

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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