अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मत दुखी हो रे मन, यही संसार है... !!

विचित्र है दुनिया...
कितनी ही विडम्बनाएं करतीं हैं आघात...


यहाँ सहजता को
सहजता से नहीं लिया जाता है...
स्वार्थ, झूठ और पतन की परंपरा ऐसी आम है
कि सच्चाई इस दौर में ख़बर है...


कोई किसी की खोई वस्तु उस तक पहुंचा देता है...
तो ये सुर्खियाँ होती हैं...
जबकि ये सामान्य व्यवहार है...
यही होना चाहिए...


इतना पतन हो चुका है
कि...
कोई भी सीधी सच्ची बात पर
लोग सहसा विश्वास नहीं कर पाते हैं...
नेह स्नेह के पीछे भी तर्क तलाशे जाते हैं...


दुनिया कारोबार है...
मत दुखी हो रे मन, यही संसार है... !!


3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 30 अक्तूबर 2015 को 6:50 am  

संसार तो मौन है, शोर जो उठा है और सांसारिक हो गया है, उसे समझना आसान है ही नहीं

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 30 अक्तूबर 2015 को 2:16 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-10-2015) को "चाँद का तिलिस्म" (चर्चा अंक-2146) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 31 अक्तूबर 2015 को 6:18 am  


सुन्दर

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