अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

किरणें राह दिखातीं हैं... !!

जाने क्यूँ
ऐसा है... ??


मेरी नज़र
जहाँ जहाँ जाती है... 


हर जगह चीज़ें उलझी हुईं हैं...


कहीं
बातों का कोई सिरा
छूट गया है...


कहीं
जीवन का आस से
रिश्ता टूट गया है...


दीपमालिकायें
जाने क्यूँ
बुझी हुईं हैं...


हर जगह
चीज़ें
बेतरह उलझी हुईं हैं...


दामन से बाँध कर सहेजा
आस्था का पुष्प
खो गया है...


नम आँखें उदास हैं
जाने मन के मौसम को
क्या हो गया है... 


सारी विषमताएं मिल कर
नन्हें विश्वास को डिगाने पर
तूली हुईं हैं...


हर जगह
चीज़ें
बेतरह उलझी हुईं हैं...


ऐसे में
कुछ रंग बिखेरती हूँ कागज़ पर
सूरज की किरणें बनाती हूँ...


उन किरणों के प्रकाश में
कितनी ही
प्रिय कवितायेँ दोहराती हूँ...


फिर
कुछ तो
सहज होता है... 


भले
कुछ पलों के लिए ही ये
महज़ होता है...


लेकिन चलो इतना तो हो जाता है
हताश मंज़र खो जाता है 


किरणें राह दिखातीं हैं...
मन मंदिर में फिर से दीप जलातीं हैं... !!


4 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 अक्तूबर 2015 को 10:58 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (05-10-2015) को "ममता के बदलते अर्थ" (चर्चा अंक-2119) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रश्मि प्रभा... 4 अक्तूबर 2015 को 6:34 pm  

ऐसा तो कई बार होता है
यूँ कहें, बार बार होता है
लगता है अब सबकुछ खत्म
तभी कुछ मनचाहा मिल जाता है …

रचना दीक्षित 5 अक्तूबर 2015 को 10:10 am  

रौशनी की एक किरण भी आगे बढ़ते रहने का संदेशा देती है.

भावपूर्ण रचना.

Madan Mohan Saxena 7 अक्तूबर 2015 को 7:42 am  

सुन्दर प्रस्तुति

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