अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इस सागर के पार... !!


रास्ता, रहस्य, नीला विस्तार...
एक सागर और लहराता है इस सागर के पार...


उस सागर में लहर उठती है
सवेरा होता है...
खिल आती है लाली
तब जब अँधेरा सघन घनेरा होता है...


इस सागर से उस सागर तक
अपने आप में स्वयं सागर समोयी दृष्टि
जब जाती है...
जान लेती है: प्यास थी
और अंतिम छोर पर भी
ज़िन्दगी प्यासी ही रह जाती है...


कि
मीठे जल का सोता
कहीं खो गया है...
जाने
नीली उदासी को पसरे
कितना वक़्त हो गया है...


विस्मित देखते हैं विस्तार
एक सागर और लहराता है इस सागर के पार... !!


5 टिप्पणियाँ:

कालीपद "प्रसाद" 27 अक्तूबर 2015 को 3:46 am  

सुन्दर !
सुनो एक राजा की कहानी ! (काल्पनिक )

रश्मि प्रभा... 27 अक्तूबर 2015 को 4:40 am  

उस सागर में नदी की तरह मिलने को
समय भागता है
हम भागते हैं
कितने सारे परदे
कितने किनारे
अनंत गहराई
प्रयास है स्वयं को पाने की

Kavita Rawat 27 अक्तूबर 2015 को 1:20 pm  

उस सागर में लहर उठती है
सवेरा होता है...
खिल आती है लाली
तब जब अँधेरा सघन घनेरा होता है...
..लेकिन इस पार के सागर की गहराई की थाह को नहीं पा सका है...
बहुत सुन्दर

जमशेद आज़मी 28 अक्तूबर 2015 को 6:53 am  

बहुत ही सुंदर रचना।

Asha Joglekar 28 अक्तूबर 2015 को 3:27 pm  

Sagar ho ya aasman,
Dono me vahee hai bhasman.

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आज कैसे
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