अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक छोटी सी चिड़िया थी... !!

एक
छोटी सी चिड़िया थी


दूर जाती हुई और छोटी हुई जाती थी


इतनी छोटी कि फिर
विलीन हो गयी आकाश के विस्तार में
जैसे हो ही नहीं वो संसार में... !


सुख हो
या हो दुःख
उस छोटी सी चिड़ियाँ सा ही तो है


पास होता है तो अपनी चहचहाहट से
अपनी उपस्थिति यूँ भर देता है हमारे भीतर
कि उसके प्रभाव में होता है हमारा सम्पूर्ण वज़ूद 


पर है तो पाखी वाला स्वाभाव न
न सुख टिकने हैं न दुःख ही टिकने वाला है
चुग कुछ दाने हमारे धैर्य का इन्हें पंछी सा उड़ जाना है 


उड़ते हुए विलीन ये आकाश के विस्तार में
जैसे कभी रहे ही न हों हमारे संसार में... !!

8 टिप्पणियाँ:

Rahul... 14 अक्तूबर 2015 को 8:28 am  

छोटी सी चिड़िया को प्रतीक बना आपने सुन्दर तरीके से दुःख:सुख को दर्शाया है. ये हमारे आसपास ही रहते हैं. हम हीं ठीक से इसे देख नहीं पाते हैं....

रश्मि प्रभा... 14 अक्तूबर 2015 को 9:29 am  

सुख बंजारा है
दुःख डेरा जमा लेता है

Kavita Rawat 14 अक्तूबर 2015 को 9:35 am  

नश्वरता का भान हो तो जीवन सुखी से जीने का ढंग जल्दी समझ आता है
बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Anita 14 अक्तूबर 2015 को 11:31 am  

वाह ! नन्ही चिड़िया तो सुंदर पाठ पढ़ा गयी..

Dilbag Virk 14 अक्तूबर 2015 को 3:50 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2130 में दिया जाएगा
धन्यवाद

जमशेद आज़मी 15 अक्तूबर 2015 को 6:12 pm  

घर के आंगन में चहचहाती चिडि़या जिंदगी का अहम पाठ पढ़ा रही है। चिडि़या से मेरा भाव मेरी नन्‍हीं और प्‍यारी बेटी से है। मेरे ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत है।

प्रतिभा सक्सेना 16 अक्तूबर 2015 को 2:19 am  

जीवन-दर्शन का माध्यम बड़ा सटीक चुना है !

Pallavi saxena 19 अक्तूबर 2015 को 8:26 am  

सार्थक संदेश देती भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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