अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

"प्रबिसि नगर की जय सब काजा..."


इस्ताम्बुल पड़ाव था हमारी यात्रा का, मंज़िल थी अपने देश भारत की सरज़मीं ! १७ की रात इस्ताम्बुल से उड़े हम भारत के लिए... १८.०१.२०१४  की सुबह दिल्ली में हुई... !! क्या सुबह थी... इतने समय बाद अपने देश की हवाओं का छू कर जाना... अपनी धरती से मिलना और मिलना किसी अभिन्न से... !! कविता के आँगन में यूँ ही दृश्य जुड़ते हैं... जुदा जुदा राहियों को जोड़ती है कविता... !! सुरेश जी, उस दिन आपके दर्शण पाकर हम धन्य हुए... ये कृपा देखें फिर कब होती है... कब पुनः मिलते हैं हमलोग...
उस दिन का वृतांत तो लिखा ही जा चुका है... तो अब बढ़ते हैं अगले दिन की ओर...
[ १९.०१.२०१४ ]
रात को ट्रेन पकड़नी थी जमशेदपुर के लिए... बस दिन भर का समय था और बीसियों काम... लेकिन ये भी पता था कि अगर इस बार आज के दिन नहीं मिल पाए तो फिर शायद समय न मिले... तो ११ बजे के आसपास हमने निर्णय लिया कि जायेंगे महरौली... समय कैलकुलेट किया कि अभी निकले तो पांच बजे तक भी लौट पाए तो मैनेज़ हो जायेगा... फिर क्या था पापा से परमिशन लिया... भाई ने वहां पहुँचने का तरीका सुशील जी को समझाया और हम निकल पड़े ललित भैया के दर्शनार्थ... !!
गाज़ियाबाद से महरौली... लम्बी यात्रा... पर, यात्रा पर निकल पड़े हम "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." मन ही मन दोहरा कर...
मेट्रो, फिर ऑटो, फिर फ़ोन पर ललित भैया के लगातार मिल रहे इंस्ट्रकसन को फॉलो करते हुए, हम लोग बनारस सी गलियों को दिल्ली में पार करते हुए, ललित कुमार के निवास स्थल पर पहुंचे एक बजे के आसपास... !!
छत पर विराजमान थे ललित "महरौलवी" साहब, तो हमलोग छत पर पहुंचे... क़ुतुब मीनार वहीँ छत से देखा... कितने समय बाद घर का खाना खाया... आंटी के हाथ का प्यार से परोसा हुआ भोजन आज भी नहीं भूलता... !!
एक दिन पहले पाँव में कुछ चुभ गया था और भाग दौड़ में मौक़ा ही नहीं मिला कि उपचार किया जाए पाँव की तकलीफ का... वहां ललित भैया के घर की छत पर आराम से बैठे तो ये कष्ट भी ध्यान आ गया... तुरंत समाधान भी हुआ... स्टॉकहोम  से गिरते पड़ते पहुंचे थे हम उस मोमेंट तक... इतनी लम्बी यात्रा, मेरी बेतरतीबी और समय के अभाव ने तलुवों की वो स्थिति कर दी थी... कि धुले न होने के कारण कहाँ कहाँ की मिट्टी ढोए चल रहे थे पाँव... बैंड-ऐड लगाने से पहले, पहले तो धोने होंगे पाँव ठीक से... कि पता तो चले कि बैंड-ऐड लगानी किधर है... खैर, ये सब हुआ!
अब हम ललित भैया के कमरे में बैठे हैं... चाकलेट के रैपर पर लिखी स्वीडिश ट्रांसलेट करके उनको बता रहे थे... ऐसी ही कितनी छोटी मोटी बेतुकी बातें की हमने... पहली बार मिले हम लेकिन ऐसा लगा ही नहीं कि जैसे पहली बार मिलना हुआ है...
सामने वाले की सहजता आपको भी कब सहज कर देती है... ये आप खुद भी नहीं समझ पाते... व्यक्तित्व की महानता सहजता में ही तो है... और ये दोनों उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं...
करीब दो बजने को थे और निकलने की तैयारी करनी थी, पांच बजे तक वापस घर लौटना था स्टेशन निकलने के लिए... !! हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें... ये तो बस आने जाने जैसा था... पल में बीत गया समय... घर जाकर याद आएगा... "अरे! ये तो कहा ही नहीं... ये कहना था, ये पूछना था..."; "काहे चिंतित हो", ये पूछने पर, हम अपनी चिंता व्यक्त कर दिए... तो समाधान भी मिला... "फिर मिलेंगे न"... और ये भी कि शेष बकबक फ़ोन पर भी तो कर ही सकती हो... !! बात तो सही है पर ये "फिर" इतनी आसानी से थोड़े ही घटित होता है... और फ़ोन... ये तो और भी दुर्लभ... टाइमिंग, व्यस्तता, मेरा संकोच... ये सब भी तो आड़े आने हैं... तो ये विकल्प तो निल ही है... ! ज़िन्दगी सरपट दौड़ती है, हम सोचते हैं कि लौट जायेंगे... लौट पाएंगे... पर ऐसा होता कहाँ है... लौटना सुखद तो है पर आसान नहीं... !!

खैर, अचानक से मेरा मन हुआ कि "दो लाइन लिख दीजिये कुछ... हमको आपकी लिखावट में कुछ चाहिए..." शायद ऑटोग्राफ टाइप कुछ... अलमारी से हमने ही किताब निकाली... उसी को हस्ताक्षरित कर उन्होंने दिया हमको... !
अब विदाई की घड़ी आ गयी थी... पर इतना समय नहीं था कि विदाई के पहले वाला रोना धोना हम लोग विधिवत कर सकें... ! हँसते हँसते, मन में पावन संतोष लिए, हम वहां से चले तो ललित भैया फ़ोन पर रास्ता बताते हुए हमारे साथ ही रहे... ऑटो जहाँ मिलती है वहां पहुँचा कर फ़ोन रख दिया उन्होंने... !!
विरल अनुभव था, मेरे और सुशील जी, दोनों के लिए... वी वर ग्लैड दैट वी कुड एक्चुअली मेक इट टू हिज प्लेस, डेसपाईट द टाइट सेड्यूल !!
अब घर पर फ़ोन करके भाई से कन्फर्म किया कि हमलोग ठीक समय पर उधर पहुँच जायेंगे न... और ये भी कि उनलोगों ने सारी पैकिंग तो कर ली है ... बस हम पहुंचें और चल दें ऐसी भी स्थिति हो तो भी समस्या नहीं होगी... !
अब दिल्ली मेट्रो के सफ़र में हम इत्मीनान से कविता कोश पलट रहे थे और सुशील जी को भी कुछ कुछ दिखा रहे थे... इसी सबमें जाने रास्ते में हमने कैमरा कहाँ गिरा दिया... ख्याल ही नहीं रहा...! ये तस्वीरें होती ही नहीं... अगर ललित भैया ने ट्रांसफर नहीं कर लिया होता तस्वीरों को अपने पास... ! शायद कैमरे को खोना था, और क्लिक की गयी तस्वीरों को बचना लिखा था इसीलिए तो प्रेरणा हुई होगी न... कि "निकालो मेमोरी कार्ड, ट्रान्सफर कर लेता हूँ फ़ोटोज़...", फिर कभी तुरंत बाद ही इ मेल से मिली हमको भी ये तस्वीरें... यादें हैं, खो जातीं तो अफ़सोस ही रह जाता... ! खैर...
अब अगली पोस्ट में कविता कोश पुस्तक के बारे में लिखेंगे... उस यात्रा को पढना... टेक्निकालिटी को समझना इत्यादि इत्यादि... अभी हम थक गए हैं... मन में ही दिल्ली की यात्रा और ट्रैफिक को याद कर के... तो अभी बस विराम और विश्राम की मुद्रा में है मन और कलम भी... !!
*** *** ***
यहाँ अनुशील पर उन पलों को सहेजते हुए कितना वक़्त लग गया हमें... दशमलव पर भी अपडेट है... तब ही उन्होंने दर्ज़ कर दिया था अपने यहाँ... :)

3 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 19 सितंबर 2015 को 6:50 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-09-2015) को "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." (चर्चा अंक-2104) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

abhishek shukla 20 सितंबर 2015 को 10:05 am  

सजीव चित्रण।

मन के - मनके 21 सितंबर 2015 को 1:14 pm  

in journey--we are.

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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