अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अन्धकार और किरण... !!

ठहरते हुए
रह रह कर...
कितना कुछ
अनकहा ही रहा
कह कह कर... ... 


नदिया ने
नहीं छोड़ी अपनी जिद्द...
पत्थर पर
खींचती रही लकीर
निर्बाध बह बह कर... ...


उफ़ तक नहीं करती
कभी भी...
हो गयी है
धरती निस्तेज़
यूँ हमारे अत्याचार सह सह कर... ... 


कब मुड़ेंगे कदम ?
कब कुछ सार्थक बदलाव हेतु
नींव की ईंट बनेंगे हम... ?
या यूँ ही रह जाएँगी
सारी सैद्धांतिक इमारतें
ढह ढह कर... ... !!


मौन बोले
मुखर यूँ संवाद हों...
अब कितना कुछ जताया जाये
क्या कुछ बताया जाए
कह कह कर... ...


अन्धकार तो
असीम है...
लेकिन रौशनी भी है
कौंध जाती है आस विश्वास की शक्ल में
रह रह कर... ... !!

3 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash 11 सितंबर 2015 को 1:40 pm  

अन्धकार तो
असीम है...
लेकिन रौशनी भी है
कौंध जाती है आस विश्वास की शक्ल में
रह रह कर... ... !!

उत्साहवर्धक एवं आशा जगाती कविता।

सादर

Anupama Tripathi 11 सितंबर 2015 को 4:17 pm  

सहज और सुंदर सकारात्मक भाव लिए हुए !!

Onkar 12 सितंबर 2015 को 7:50 am  

उत्कृष्ट प्रस्तुति

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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