अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितने बादल... कितनी बारिश... !!









खिड़कियों की उदासी
परदे से झांकते सपने
दूर अम्बर पर खिलती कविता... !


ज़िन्दगी की बेतरतीबी में
कुछ एक पलों का अवकाश बन
अनचीन्हे अनजाने मोड़ों पर मिलती कविता... !!


ये बादल
क्या आज बरसेंगे... ?
धरती की हरीतिमा में
समा कर हरसेंगे... ?? 


या यूँ ही
घिर कर... घेर कर...
छंट जायेंगे... ?
बादल
आज फिर
बिन बरसे ही सिमट जायेंगे... ?? 


जाने
क्या है ?
धरा-अम्बर के मन में...
क्या है ऐसा ?
इस रोज़ गुज़रते जीवन में... 


जो हम
हारे थके फिर सपने बुनते हैं... !
श्मशान से लौटते हुए भी जीवन ही गुनते हैं... !!


कितने बादल... कितनी बारिश... ?
ये गणित, जाने देते हैं...


चल रही है... साँसों की धुन...
उसे, राम नाम की धुन, गाने देते हैं... !!

1 टिप्पणियाँ:

Madan Mohan Saxena 23 सितंबर 2015 को 8:04 am  

भावपूर्ण
कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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