बहुत सारे काले बादल हैं... बारिश है... कांच पर बूँदें हैं... और मन में कितनी ही आशंकाएं उमड़ घुमड़ रहीं हैं... मेरे सामने कितने सारे अधूरे काम पड़े हैं... डेड लाइन्स हैं... फिर भी कुछ करने की इच्छा नहीं... ये जाने कैसी मनःस्थिति है... ये भी सब... पता नहीं क्यूँ... हम लिखे जा रहे हैं, जैसे कहकर यूँ अपने आप से ही सबकुछ... कोई समाधान निकल जाने वाला है! इस्ताम्बुल वाली बाक़ी कड़ियाँ ही लिख पाते तो भी एक कार्य समाप्त होता... पर वो भी नहीं... ! आजकल ये बेमतलब रंगों से कुछ कुछ कागज़ पर उकेरने का शौक जागा है... उधर भी मन नहीं जा रहा... तबियत ठीक न हो... मन ठीक न हो... तो कुछ भी ठीक नहीं होता... और ऐसे में कोई नहीं जिसको फ़ोन करके ही सही, तंग कर सकें... नींद भी गायब है... लिखने का भी मन नहीं... अरे तो ये क्या है... ??? ये... ये तो सब बेवजह की बकवास है... पर यही सही... कौन जाने, शायद ये बकवास ही कुछ सही करे... !!
प्रिय कलम! कुछ करो...
स्याहियों! आपस में मिल जाओ
कोई एक नया रंग सृजित हो कुछ रचो अप्रतिम... !!
जब तक यूँ खिट-पिट कर रहे हैं यूँ ही हम कीबोर्ड पर...
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें