अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कभी तो होगा, हे जीवन! तेरा आगमन... !!

कुछ न कुछ
घटित होता ही रहता है
हर पल...
कब
घटित होगा
जीवन...


कितने आंसू गिरे
कितना तो नम
हृदय तल...
और
कितना भींगेंगे
नयन... 


हम
प्रश्न ही तो सजाते जाते हैं
जाने कब ढूँढेंगे हल...
यहाँ वहाँ
विचरते हैं
कब थाहेंगे मन...


नदिया
बहती हुई भजन गाती है
पर्वत प्रार्थनारत अचल...
अपने अपने
तौर तरीके
अपना अपना चलन...


ज़िन्दगी
भाग रही है अपने रास्ते
आँखें लिए सजल...
कभी तो आएगी मंज़िल
कभी तो सिद्ध होंगे शुभ संकल्प
कभी तो होगा, हे जीवन! तेरा आगमन... !!



1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 21 सितंबर 2015 को 1:54 pm  

मंज़िल की खोज में अनवरत चलना है
… तभी तो जीवन है
मृत्यु के बाद रहस्य है
आत्मा अमर है

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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