अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितने आकाश... !!

कैसी कैसी फ़िक्र,
कैसी कैसी चिंताएं...
ले कर आती हैं दूरियां !! 


मन का आकाश
कितने आकाशों की ओर तकता है...
क्या कुछ नहीं समाहित किये हुए धड़कता है...


जो जहाँ हैं
सब जुड़े ही हैं
कि मन वीणा के तार तरंगित हैं...
ये दूरियां आभास मात्र हैं
ज़िंदगियाँ सभी
इस "साथ" पर ही अवलंबित हैं...


दौड़ कर
देखने पहुँच जाता है मन...
घर का आँगन...


धूप तो तेज़ नहीं होगी न...


मम्मी! ज्यादा थकना मत...
आज प्रसाद बनाने में इतना भी मत लगना भीड़ना
ज्यादा देर आग के पास मत रहना...


वहां और यहाँ के समय में अंतर है न...
वहां तो अबतक धूप हो गयी होगी...
यहाँ अभी रात ही है...
पर मेरे लिए यह प्रभात ही है...
कि वहां भोर हो गयी है... !!


मेहँदी खिल आई होगी न...
ज़रा रंगों की तस्वीर भेजना...
घर द्वार से ज्यादा आज खुद को सहेजना...


हममें से कोई है नहीं वहां...
कल सुबह पारण कौन बनाएगा...


हमने कभी नहीं सोचा था
एक दिन ये सब बातों में सीमित हो कर रह जायेगा...


हाँ! बहना तुम भी
ख्याल रखना
पिछले साल की ही तरह
खूब सजना धजना 


दूसरी तीज यह तुम्हारी
पहली तीज वाले ही उत्साह के साथ बीत जाये...
सुख सौभाग्य का दीप
तुम्हारे आँगन मुस्कुराये...


ईश्वर मेरा भी कल्याण करें
वो तो सर्वव्याप्त हैं, मेरी कुटिया को भी अपना धाम करें... !!



*** *** ***

सभी को हरितालिका तीज व्रत की शुभकामनाएं... 

2 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 16 सितंबर 2015 को 4:16 pm  

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-09-2015 को चर्चा मंच के अंक चर्चा - 2101
में की जाएगी
धन्यवाद

संजय भास्‍कर 17 सितंबर 2015 को 7:45 am  

बहुत ही सुंदर और प्यारी कविता. मन के भावों का मंद मंद झोंका मन प्रसन्न कर गया.

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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