आसमान देखते हुए... !!


वो चलते हुए गगन में
गगन का हो कर भी...
धरा का है...


आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है...


ऐसे कैसे अँधेरा बना रहेगा
आस का सन्देश, उसके आँचल से बंध, आएगा...
ये काम हवा का है...


विषमताओं से वो क्यूँ हो विचलित
जब दूर चमकते चाँद का सर्वस्व...
धरा का है...


आसमान तकते हुए
हम संभावनाएं तलाशते हैं...
ज़िन्दगी का सारा फ़लसफ़ा धुआं सा है...


आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है... !!


5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 30 सितंबर 2015 को 7:41 am बजे  

कुछ धुआँ कुछ रौशनी कुछ अँधेरा कुछ धूप छाँव … यही है यात्रा

yashoda Agrawal 30 सितंबर 2015 को 7:47 am बजे  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 01 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Anita 30 सितंबर 2015 को 10:19 am बजे  

आस का संदेस तो पल पल आ रहा है..हम वर्तमान को चूक जाते हैं सदा..

डॉ. दिलबागसिंह विर्क 30 सितंबर 2015 को 3:54 pm बजे  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2115 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Madan Mohan Saxena 1 अक्टूबर 2015 को 10:57 am बजे  

बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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