वो चलते हुए गगन में
गगन का हो कर भी...
धरा का है...
आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है...
ऐसे कैसे अँधेरा बना रहेगा
आस का सन्देश, उसके आँचल से बंध, आएगा...
ये काम हवा का है...
विषमताओं से वो क्यूँ हो विचलित
जब दूर चमकते चाँद का सर्वस्व...
धरा का है...
आसमान तकते हुए
हम संभावनाएं तलाशते हैं...
ज़िन्दगी का सारा फ़लसफ़ा धुआं सा है...
आसमान में
जलता हुआ वो दीप...
दुआ का है... !!
5 टिप्पणियाँ:
कुछ धुआँ कुछ रौशनी कुछ अँधेरा कुछ धूप छाँव … यही है यात्रा
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 01 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
आस का संदेस तो पल पल आ रहा है..हम वर्तमान को चूक जाते हैं सदा..
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 1 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2115 में दिया जाएगा
धन्यवाद
बेह्तरीन अभिव्यक्ति
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