अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मीरा... !!

बुखार
खोयी सी संतुलन की धार


रोता सिसकता मन
तड़पता हुआ
जीवन


रो रो कर सारा घर सर पर उठाये हुए
जो परेशान हुए जा रहे थे...


किसे पुकारें इस बात की
थाह नहीं पा रहे थे...


तभी दूर से आवाज़ आई...



कुछ रचनात्मक करो सब भूल जाओ
मीरा बनाओ...!!

*** *** ***


यूँ ही शुरू किया... कुछ लकीरें खींचीं... और एक आकृति बन गयी... भक्ति में लीन मुख की सुषमा जाने कैसी होती होगी... इतनी क्षमता न पेंसिल में है, न शब्दों में कि उकेर सके, वह आभामंडल...
ईश्वर सब जानते हैं... उन्हें स्वीकार है हर एक प्रयत्न हमारा... बस भाव ही तो प्रमुख है, शेष सब गौण... !!

2 टिप्पणियाँ:

Anita 6 सितंबर 2015 को 10:07 am  

बहुत सुंदर...अब तो सब ठीक है न..

अनुपमा पाठक 6 सितंबर 2015 को 10:20 am  

जी, बेहतर है... :)

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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